Tuesday, July 5, 2011

महज एक खेल


जीवन के हिस्से हैं
हताशा और व्यवधान
जूझते जाना पल पल के
ध्यान विकर्षण और पथ विचलन से
लेकिन मायने रखता है कि कैसे
खेलते हो तुम इस नियति के खेल को
एक बड़ी सी हार्ड डिस्क और
छोटे सीमित से रैम से ...

गेंद भले है तुम्हारे हाथों में
मगर तुम्हारी ज़रा सी चूक और भूलें
ही तो करेगीं इसके रास्ते तय
गेंद घूमेगी तयशुदा या
किसी गलत रास्ते पर
और यह तय होगा
तुम्हारे कमजोर या मजबूत इरादों से ..
..और ऐसे ही यह खेल निर्णायक होगा
और होगी तय ऐसे ही तुम्हारी
हार या जीत ....

राह के खतरे और रुकावटें
राह की कर्कश डरावनी आवाजें
हों निर्दयी कितनी भी...
नहीं डरना नहीं है तुम्हे
बने रहना है सतत निर्भीक ...
क्योंकि मंजर बदलते हैं
हमेशा होती है
हर वक्त के बदलने और
संभलने की हमेशा गुंजाईश

अपनी जड़ता को छोडो
करो अपने लक्ष्य को लक्षित
यह वक्त है आगे बढ़ने
और बस बढ़ते जाने का
भले ही मिल जायं रास्ते में
घात और प्रतिघात
दोस्ती के मुखौटों में
और हो जाय तुम्हारे विवेक की
एक कठिन परीक्षा ....
किन्तु अपनी रक्षा और
आक्रमण की भूमिका
निभानी है अब खुद तुम्हे ही
चक्रव्यूह से निकल भागने
की नहीं कोई राह अब ...

रास्ते तुम्हे अब चुनने हैं नए
या फिर पहले से आजमाए हुए
भविष्य की कोख में क्या छुपा है
कौन जानता है ?
शांत और सयंत हो लक्ष्य - भेदन
ही है बुद्धिमत्ता की राह ...
खुद पर आंच आये बिना और
बिना किसी पर दोषारोपण के ...
वैसे भी जीत हार में कैसी शर्मिन्दगी
जब जीवन है
महज एक खेल

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16 comments:

  1. क्योंकि मंजर बदलते हैं
    हमेशा होती है
    हर वक्त के बदलने और
    संभलने की हमेशा गुंजाईश

    आपके ज्ञान की शुभ 'ज्योति' में मन में प्रकाश हो रहा है ज्योति जी.

    अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

    मेरे ब्लॉग पर भी इस प्रकाश की आवश्यकता है.

    कृपा बनाये रखियेगा.

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. बहुत सुंदर ...प्रभावित करती रचना

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  4. बहुत सुंदर .

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  5. एक सच्चा खिलाडी और खेल भावना ही जिंदगी के खेल का वास्तविक आनंद उठा सकता है. महत्त्वपूर्ण सिर्फ जीत नहीं बल्कि अपने खेल का आनंद उठाना भी है.

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  6. खुद पर आंच आये बिना और
    बिना किसी पर दोषारोपण के ...
    वैसे भी जीत हार में कैसी शर्मिन्दगी
    जब जीवन है
    महज एक खेल ||
    nice lines
    ____________________________
    किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||

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  7. राह के खतरे और रुकावटें
    राह की कर्कश डरावनी आवाजें
    हों निर्दयी कितनी भी...
    नहीं डरना नहीं है तुम्हे
    बने रहना है सतत निर्भीक ..

    जीवन में आशा का संचार करती आपकी यह पोस्ट ...जीवन का यह कौन समझ सकता है ...आपने बहुत गंभीरता से विश्लेषण किया है ....आपका आभार

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  8. हाँ खेल के रूप में ही लेना चाहिए जीवन को .लेकिन खेल भावना से .कभी जीत कभी हार .असल बात है प्रति - भागी होना .

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  9. बहुत सुंदर भाव प्रस्तुत किये जा रहें हैं,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  10. Jyoti,

    MAIN AAPKE DONO BHASHAON MEIN EK JAISA LIKHNE SE BAHUT PRABHIVIT HOON. MAIN BHI KOSHISH KARTAA HOON :

    ZINDAGI EK AISA KHEL HAI JO HUM CHAHEIN YA NAA PAR KHELNA HAI,
    HUM ISE PASAND KARE YA NA PHIR BHI HAMEIN THAHRNA HAI.

    Take care

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  11. यदि‍ हम पि‍छले 5 बरस पहले लि‍खी डायरी पर नजर डालेंगे तो हंसी आयेगी। ऐसा इसलि‍ये होता है कि‍ हमारे अनुभव बढ़ते हैं और कुछ चीजें जो बहुत ही चि‍कनी, ठंडी और शुद्ध पवि‍त्र जान पड़ती थीं, चमकती थीं... मालूम पड़ता है कि‍ वो हीरा नहीं थीं। लेकि‍न कांच से प्‍यार करने के अपने सुभीते हैं।

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  12. जीत कर भी हार होती है,हार के भी जीत होती है .फिर जीत-हार का क्या अर्थ .सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  13. रास्ते तुम्हे अब चुनने हैं नए
    या फिर पहले से आजमाए हुए
    भविष्य की कोख में क्या छुपा है
    कौन जानता है ?
    शांत और सयंत हो लक्ष्य - भेदन
    ही है बुद्धिमत्ता की राह ...
    खुद पर आंच आये बिना और
    बिना किसी पर दोषारोपण के ...
    वैसे भी जीत हार में कैसी शर्मिन्दगी
    जब जीवन है
    महज एक खेल

    क्या बात है.अत्यंत प्रभावी पोस्ट!
    हमज़बान की नयी पोस्ट मेन इटर बन गया शिवभक्त फुर्सत हो तो पढें

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  14. हमेशा होती है
    हर वक्त के बदलने और
    संभलने की हमेशा गुंजाईश


    वाह...कितनो अच्छी बात कही है आपने...बहुत प्रेरक रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  15. .

    वैसे भी जीत हार में कैसी शर्मिन्दगी
    जब जीवन है
    महज एक खेल ...

    Awesome !

    Great philosophy indeed.

    .

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