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Tuesday, December 20, 2011

दोष और विकार


 आज की इस आप धापी  भरे जीवन में और हर चीज़ में सबसे आगे रहने की होड़ में हम सब को  परफेक्शन की लत लग चुकी है | गलतियाँ व छोटी छोटी त्रुटियाँ हमें बर्दाश्त नहीं होती | 
एसा क्यों ??  हम ऐसे क्यों बनते जा रहे है ? क्यों हम लोगों की छोटी गलतियों को नज़र अंदाज नहीं कर पाते? आप अपने घर में या आफ़िस में लोगों या कर्मचारियों द्वारा की गयी ज़रा सी भूल का ऐसा तमाशा बनाते है की जैसे कुछ अति भयानक हो गया हो || 
हमारी सहन करने, और माफ़ करने की क्षमता को भगवान जाने क्या हो गया है ?

जिस प्रकार हर लिखा शब्द 
कहानी या गाना नहीं होता 
ठीक उसी प्रकार, 
कुछ काम का  न आना 
कोई पाप, या खोट 
का ठिकाना नहीं होता |

क्यों पड़े हम इस 
सर्वदा-पूर्णता के कुचक्र में |
विशुध्ता, के दुष्चक्र में |
क्यों नहीं  झेल पाते 
हम ज़रा सी गलती को   ?
क्या हो गया हमारी, 
मानवता की  भावना को ?

थोडा सा दोष कुछ 
बुरा नहीं  होता |
एसा इन्सान कोई हैवान नहीं होता |
सब में कोई न कोई दोष |
फिर क्यों ये बवाल 
और कैसा ये रोष ??

चलो उठ जाये ऊपर दोषारोपण और 
दोष की भावनाओं से |
क्यों न थोडा मज़ा ले, 
दोषयुक्त जीवन का |
सुधार नाम की चीज़ भी होती है 
इस दुनिया में, 
कोई भी पूर्ण रूप से परिपूर्ण नहीं इस जहाँ में |

तो अगली बार अगर आपको कोई गलती करता दिखे, तो उस पर पुरे जहाँ का गुस्सा उतरने की बजाय उसे या तो दूसरा मौका दे, या दूसरा काम ही दे दे | क्योंकि हर व्यक्ति, हर समय, हर काम में अच्छा हो, संभव नहीं |
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Imperfection
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